तमाम भौतिक सुख सुविधाओं के बावजूद आज मनुष्य अपने आपको अत्यंत अशांत महसूस कर रहा है, यूं कहना चाहिए कि जैसे जैसे हमने भौतिक सुख साधन जुटाएं हैं, हमने हमारी मन की शान्ति खो दी है। कोई कहे कि मैं यह कैसे कह रहा हूँ कि मनुष्य अपने आपको अशांत महसूस कर रहा है, इसके जवाब में मेरा तर्क होगा कि आज जगह जगह ध्यान केंद्र चल रहे हैं, मेडिटेशन सेंटर चल रहे हैं, लोगों की बेतहाशा भीड़ उनमें अपनी शान्ति खोज कर रही है, यह इसी बात का प्रमाण है। विदेशी लोग जिस शांति को भारत की मंत्र, योग, प्रार्थना एवं विभिन्न आध्यात्मिक आहार विहार की साधनाओं एवं क्रियाओं द्वारा प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं हम विगत दशकों में इनसे दूर हुए हैं । कई सालों से मेरा इस बारे में चिंतन मनन चलता रहा है, मेरे मस्तिष्क में बहुत सारी बाते आती जाती रही है, नए नए विचार आए हैं, जिनके परिप्रेक्ष्य में कुछ को मैं यहाँ शेयर करने जा रहा हूँ. हमारा भारत ध्यान एवं विशिष्ट विद्याओं का मुख्य केंद्र हुआ करता था, इसका एक मुख्य कारण हमारे ऋषि मुनि का ध्यान में तल्लीन हो जाना, ध्यान की सिद्धि प्राप्त हो जाना, जो अब दूर हो गई है। ध्यान की सिद्धि से त्रि -नेत्र खुलना सम्भव होना, टेलीपैथी जैसी योग्यताएं प्राप्त होना सम्भव था। ध्यान की सिद्धि के लिए जो वातावरण एवं परिस्थितियाँ हमारे देश में ज्यादा रूप में सुलभ तरीके से उपलब्ध होती थी वो अन्यत्र कम थी। हमारे देश की आध्यात्मिक व्यवस्था के अनुसार आयु के अंतिम वर्षों में संन्यास ले लेना या संन्यास के तुल्य जैसा जीवन बिताना शामिल था, अर्थात राग, द्वेष, मोह को बिलकुल छोड़ना या कम करना, आत्मा के कल्याण की तरफ ध्यान देना शामिल था, जो कि जंगलों एवं निर्जन पर्वतों पर ही सम्भव थी। भौतिक विकास करने की तरफ ध्यान देने में हम हमारी इस मूलभूत आवश्यकता को भूल से गए हैं। आज का मेरा यह लेख इसी मूल आवश्यकता को पूरा करने या कराने के तरफ ध्यान दिए जाने पर केंद्रित है, जिसको यदि पूरा किया जावे तो पर्यावरण सरंक्षण को तो बढ़ावा मिलेगा ही, साथ ही साथ पर्यावरणीय विषमताओं के कारण हो रही बीमारियों एवं विभिन्न कष्टों को रोकने की दिशा में भी गति सम्भव होगी। मेरे विचार से हम जिस नगर उप नगर में रहते हैं, उसके बाहर या निकट में कहीं बड़े क्षेत्र को घेरे हुए इस तरह के जंगल होने चाहिए, जिनको यहाँ जंगल तो विषय की स्पष्टता दर्शाने की दृष्टि से कहा जा रहा है, मेरा अभिप्राय: नगर के बाहर घने विशाल पेड़ पौधों, नदी नालों कंकर पत्थर युक्त शिला आदि लिए हुए बड़े स्थान होने से है, अर्थात जंगल जैसा दिखने वाला ऐसा वातावरण हो, जिसमें खतरनाक किस्म के जानवरों को छोड़कर सब तरह के जानवर (पशु - पक्षी) भी स्वतंत्रता पूर्वक गमन कर सकें, प्रकृति की खुली हवा में पूर्ण आजादी से अपना जीवन यापन कर सकें। आज के आधुनिक परिप्रेक्ष्य में मैं नगर के बाहर या नगर से कुछ दूर कोई जंगल जैसी जगह स्थापित करने की बात करूँ तो सबको बड़ी अटपटी या बेहूदी लगेगी, केवल विषय की स्पष्टता की दृष्टि से मैं ऐसे स्थान हेतु यहाँ जंगल शब्द प्रयुक्त कर रहा हूँ। मेरे विचार अनुसार यह होना बहुत आवश्यक है, मेरे इस विचार का विभिन्न परिप्रेक्ष्यों में परीक्षण होना चाहिए, यहाँ तक क़ि पशु पक्षी जो पिंजरे में कैद जीवन बिता रहें हैं, आजादी के बाद उनके जीवन में क्या परिवर्तन आएगा, इस बात तक पर परीक्षण होना चाहिए । इस तरह की व्यवस्था करने से हम लोगों के जीवन, हमारे नगर के वातावरण पर क्या शुभ प्रभाव पड़ सकता है, इसके अभाव में हम लोगों पर क्या विपरीतताएं आ गई है, संभावित विभिन्न लाभों के दृष्टिकोण में साथ ही व्यवहारिक दृष्टि से ऐसी जगह बनाना किस हद तक सम्भव है, सब पर चिंतन एवं परीक्षण होना चाहिए। यद्यपि हमारी सरकार का ध्यान पर्यावरण संतुलन को लेकर विगत वर्षों में काफी गया है जिसके तहत हर नई कॉलोनी में आज बगीचे अनिवार्य रूप से बनाए जा रहे हैं, पर्याप्त जगह इस हेतु छोड़ी जा रही है, मेरा मानना है यह पर्याप्त नहीं है, हमारे विभिन्न कष्टों एवं बीमारियों का निवारण करने के लिए हमें हमारी कुछ पुरानी व्यवस्थाओं में आधुनिक परिस्थितियों से तालमेल बैठाते हुए लौटना अति आवश्यक होगा, जिसके क्रम में ही उक्त विचार यहाँ प्रकट किया गया है। मेरे चिंतन में स्पष्ट: यह बात आई है कि विभिन्न तरह के जाति प्रजाति के पशु पक्षी पर्यावरणीय संतुलन को बनाने का काम करते हैं, विभिन्न प्रकार के विशाल पेड़ इस कार्य में सहायता करते हैं, नदी नालों का जो पानी पेड़ पौधों पर गुजरते हुए विभिन्न तरह के कंकर पत्थरों से टकराते हुए पीने के काम आता था, वो विशेष शक्ति युक्त हो जाता था, तरह तरह के लवण एवं तत्व उसमें शामिल हो जाते थे, आधुनिकता की दौड़ में हमने इन सब का अभाव ही कर ही दिया है, इस कारण पूर्वजों जैसी शक्ति हममें नहीं रही है, नित नई किस्म की बीमारियों का हम सामना कर रहे हैं, इन सब की किसी हद तक पूर्ति का हल मुझे उक्त व्यवस्था से सम्भव नज़र आ रहा है। हम ध्यान की सिद्धि चाहते हैं वो ऐसे शांत वातावरण में ही सम्भव है, जहाँ टेलीफोन, मोबाइल, टी वी आदि की तरंगो का अभाव हो, जहाँ पूर्णतः प्राकृतिक वातावरण हो, जहाँ शान्ति हो, उसी वातावरण में ध्यान आदि की सिद्धि सम्भव है। हमने बिना सोचे समझे बेतहाशा रूप में जंगल के जंगल काट दिए, खेत हटा दिए, पूर्व परीक्षण नहीं किया कि इन सबसे हमारे पर्यावरण संतुलन पर क्या प्रभाव पड़ेगा। वो जंगल, खेत अब वापिस तो नहीं ला जा सकते, अब तो उसका विकल्प ही स्थापित किया जा सकता है जो उक्त रूप में ही सम्भव है। मेरे विचार से जहाँ सरकार सभी वर्गों,लोगों एवं प्राणियों के हित में योजनाएं लाती है, उसे हमारे देश की आध्यात्मिक व्यवस्था में दी गई व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए महान ऋषि - मुनियों के आध्यात्मिक हितों को ध्यान में रखते हुए उनके परम लक्ष्य की पूर्ति में भी सहायक बनते हुए दूर दराज स्थापित ऐसे वनों, जंगलों आदि को विभिन्न व्यापक हितों के परिप्रेक्ष्य में काटना/हटाना तुरंत बंद कर देना चाहिए, अपितु इस हेतु और अधिक नजदीकी जगह प्राकृतिक वातावरण तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए।
जब एक तरफ दूर दूर तक आवासीय कालोनियां बसाई जा रही है, शहर के बाहर की जगह की कीमतें करोड़ों को छू रही है, मेरी बात बहुतों को हास्यापद ही लगेगी, किन्तु मैं फिर भी अपना चिंतन सामने रख रहा हूँ, मैं मेरे उक्त विचार को आज की सबसे मूल भूत आवश्यकता के रूप में सामने रख रहा हूँ। एक समय था जब आदमी बहुत अशांति महसूस करता था या उसे वैराग्य हो जाता था या उसको संन्यास की आवश्यकता महसूस होती तो वो वन को गमन कर जाता था। आज वन नहीं है, बाग़ बगीचें भी आसपास बना दो तो भी ध्यान एवं समाधि का वन जैसा वातावरण ऐसे बाग़ बगीचे नहीं दे सकते, जिसके कि अभाव में हमारे ऋषि मुनि वो सिद्धियां या आश्चर्यजनक बातें सामने लाने में सामर्थ्यशील भी नहीं हो सकते, हमारे आसपास विचारों के साथ विभिन्न तरह तरंगो का व्यापक जाल है, प्रदूषित वातावरण है, जिसमें ध्यान की पूर्ण सिद्धि सम्भव नहीं है। हमारे आध्यात्मिक गुरु जन पहले जैसी ऋद्धियाँ प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं, उनमें यह भी एक बड़ा कारण है, जिसमें वन जैसी उपयुक्त जगह का अभाव होना है। हम जो पर्यावरण को गति दे रहे हैं वह पर्याप्त नहीं है, सृष्टि की रक्षा, पर्यावरणीय संतुलन के लिए उक्त बातों पर विचार आज पहली बड़ी जरुरत होनी चाहिए। विषम होते जा रहे वातावरण में पर्यावरण सरंक्षण को सबसे बड़ा कर्त्तव्य घोषित किया जाना चाहिए, उक्त के अलावा भी जहाँ भी सम्भव हो पर्यावरण बढ़ाने से सम्बंधित कार्य करने वाले को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। हमने देखा है कि विदेशी राष्ट्रों में हमारी विद्याओं/आध्यात्मिक शक्तियों की तरफ समय समय पर ध्यान गया है, उनमे इन सबको लेकर शोध एवं अनुसंधान की तरफ विशेष जिज्ञासा है और तुरंत पहल करने की रूचि भी है, वे उक्त दिशा में पहले पहल करें, इससे पूर्व हमें इस दिशा में पहल करनी चाहिए,क्योंकि एक इस तरफ बड़ी पहल करने पर पर्यावरण को ज्यादा शीघ्रता से बढ़ा पाएंगे, पशु पक्षी की विभिन्न जाति - प्रजाति को सरंक्षित करने की दिशा में आगे बढ़ते हुए इनके द्वारा होने वाले पर्यावरणीय संतुलन को स्थापित करने में गति कर पाएंगे, हमारे भारतीय जीवन का जो एक मूलभूत तत्व या उद्देश्य है जिसके तहत हम या हमारे ऋषि मुनि ध्यान साधना के लिए कोई उपयुक्त स्थान/वातावरण पा सकें, उसको पूरा करने में सफल हो पाएंगे। इसके अलावा अनगिनत प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष ऐसे विभिन्न लाभ जिनसे हम सब में से प्राय :कर सब वाकिफ हैं, को पाने के दिशा में गति दे पाएंगे।
नोट: यह लेख महावीर कुमार सोनी के चिंतन मनन पर आधारित उनका मूल लेख है, आप इसे कहीं भी पुनः प्रकाशित कर सकते है, बेबसाइट, बेब पोर्टल आदि में दे सकते हैं, किन्तु देते समय लेखक का नाम आवश्यक रूप से दें. पसंद आया हो तो पर्यावरणीय हित में ज्यादा से ज्यादा शेयर करें, सरकार तक पहुंचाएं ।
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